Wednesday, August 19, 2009

काश ! इसे कोई समझाता !!


जीवन में है कितने बंधनअब तक इसको समझ न पायामन करता रहता है क्रंदनफिर भी है उसको अपनाया ।द्वंद भरा यह कैसा जीवनकभी हसता , कभी रुलातासब अपने है समझ न पातासमझ अकेला मन अकुलाता ।सारे बंधन मेरे अपनेबढ़ते जाते है क्यू सपनेदिवा स्वप्न अब थका रहे हैसमय चल दिया बाती ढकने ।कब यह बाती बुझ जायेगीकब तक यह मन बहलायेगीकाश ! इसे कोई समझातामेरे मन को राह देखता ।

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