Thursday, August 20, 2009

कैसी कैसी सरहदें


धर्म की कुछ ज़ात की कुछ हैसियत की सरहदें
आदमीयत की ज़मीं पर कैसी कैसी सरहदें
मुल्क को तो बाँट लें लेकिन ये सोचा है कभी
दिल को कैसे बाँट सकती हैं सियासी सरहदें
माँग भर कर उसने मेरी मांग ली आज़ादियाँ
अब क़फ़स है और मैं हूँ या सिन्दूरी सरहदें
मैं मोहब्बत की पुजारिन वो है नफरत का असीर
मेरी अपनी मुश्किलें हैं उसकी अपनी सरहदें
बस बहुत तौहीन करली आपने अब देखिये
खींचनी आती हैं मुझको भी अना की सरहदें
देख कर आँखों में उसकी छलछलाती चाहतें
सोचती हूँ तोड़ दूं शर्मो-'हया' की सरहदें
क़फ़स = कैद
अना = मान,घमंड
असीर = कैदी

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