
तुम खुशियों की बात हो करतेमै तो दर्द पुजारी हूँतुम सावन की बात हो करतेमै तो पतझड़ का रही हूँ ।ढूंढ़ रहे हो तुम खुशियाँलेकर के तुम शहनाईतुम्हे मिलेगा कुछ भी नहीमैंने काँटों से है नीड़ बनाई .अश्रू जहा की सम्पति है पीडा ही जहा पर वैभव है ऐसा देश रहा है मेरादर्द जहाँ पर गौरव है ।मरुथल ही जहाँ पवित्र भूमि हैदर्द के ही मन्दिर है जहाँपीडा के ही प्रेम गीत हैऐसा ही अपना है जहाँ ।
No comments:
Post a Comment
Note: Only a member of this blog may post a comment.